SurYatra : A Musical Carvan

Artists

दान सिंह जी: स्मृति उस दोपहर की

by dpagrawal on Jun.20, 2011, under Artists, General, Meeting, tribute

दान सिंह जी: स्मृति उस दोपहर की

–डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

कभी-कभी ऐसा होता है कि कोई एक रचना रचनाकार के समस्त कृतित्व पर छा जाती है. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी से पहले ‘उसने कहा था’ याद आने लगती है और भगवतीचरण वर्मा से पहले ‘चित्रलेखा’. हरिवंश राय बच्चन से पहले ‘मधुशाला’ कानों में गूंजने लगती हैं तो भीमसेन जोशी से पहले ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ का ध्यान आने लगता है. और यह क़तई ज़रूरी नहीं कि जो एक रचना हमें बेसाख्ता याद आती है वह उस कृतिकार की श्रेष्ठतम रचना ही हो. लेकिन तमाम समझ के बावज़ूद ऐसा होता है. और ऐसा ही हुआ दान सिंह के साथ भी. अपनी तरह के अनूठे और खुद्दार इस संगीतकार ने बहुत सारी उम्दा धुनें बनाईं लेकिन फिल्म माई लव का मुकेश का गाया गाना ‘ज़िक्र होता है जब कयामत का/तेरे जलवों की बात होती है’ उनके नाम का पर्याय ही बन बैठा. निस्संदेह यह एक बेहतरीन कम्पोजीशन है लेकिन संगीत के पारखियों का ऐसा मानना है कि दान सिंह जी ने इससे बेहतर बहुत सारी धुनें बनाई हैं.

मेरे मन में भी दान सिंह ‘ज़िक्र होता है’ के अप्रतिम संगीतकार के रूप में ही स्थापित थे. जब जयपुर आ बसा और यह पता चला कि वे भी जयपुर में ही रहते हैं तो स्वाभाविक है कि उनसे मिलने और बतियाने की इच्छा मन में अंगड़ाई लेने लगी. लेकिन न तो कभी किसी आयोजन में उनके दर्शन हुए और न ही कभी किसी से यह पता चला कि वे कहां रहते हैं. ज़ाहिर है कि दान सिंह जी आज के बहुत सारे हाई प्रोफाइल और कुशल मीडिया प्रबंधक लोगों में से नहीं थे. यह बताने की ज़रूरत नहीं कि आजकल तो लोग बहुत सामान्य प्रतिभा के धनी होते हुए भी कुशल मीडिया प्रबंधन के दम पर अपनी महान छवि निर्मित करवा लेते हैं. उनसे मिलने का कोई जुगाड़ बैठा नहीं.

फिर यकायक एक दिन यह पता चला कि हमारे पत्रकार मित्र ईश मधु तलवार की उनसे गहरी आत्मीयता है, तो मैं बिना संकोच उनसे यह अनुरोध कर बैठा कि वे कभी मुझे भी दान सिंह जी से मिलवाएं. और फिर जल्दी ही यह संयोग बन भी गया. यह तै हुआ कि 1 नवंबर 2009 को दोपहर में मैं श्रमजीवी पत्रकार संघ के कार्यालय में पहुंच जाऊं वहीं से तलवार जी मुझे दान सिंह जी यहां ले जाएंगे. और तै कार्यक्रम के अनुसार उस दोपहर तलवार जी के साथ भाई फारूक आफरीदी, ओमेंद्र और मैं दान सिंह जी के घर पहुंचे. फारूक़ साहब हमेशा की तरह अपने साजो-सामान से लैस थे. कुछ तैयारी मैं भी करके गया था उन विरल क्षणों को संजो लेने की. मेरे अलावा बाकी सभी मित्रों से दान सिंह जी पूर्व परिचित थे. तलवार जी के प्रति उनके मन में कितनी गहरी आत्मीयता थी, यह कुछ ही क्षणों में ज़ाहिर हो गया था.

हम लोग कोई योजनाब्द्ध इंटरव्यू का इरादा लेकर नहीं गए थे. बल्कि मेरे मन में तो बस इतनी-सी बात थी कि इस महान संगीतकार के सान्निध्य में कुछ क्षण बिताने का जो सौभाग्य मिला है उसका छक कर पान करना है. और आज जब दान सिंह जी स्मृति शेष हैं, मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अपने सान्निध्य का रस-पान कराने में उन्होंने तनिक भी कृपणता नहीं बरती. आज जब उन क्षणों को मन में रिवाइण्ड करता हूं तो पाता हूं कि उनकी सबसे बड़ी महानता तो यही थी कि उन्होंने किसी भी तरह की महानता नहीं दर्शाई. अपने जीवन में बहुत सारे लेखकों-कलाकारों के साथ वक़्त गुज़ारने के जो अगणित मौके मुझे मिले हैं जब उन पर एक नज़र दौड़ाता हूं तो पाता हूं कि बहुत ही कम लोग ऐसे थे जो अपनी तमाम उपलब्धियों के बावज़ूद इतने सहज थे जैसे कि उनकी कोई उपलब्धि ही ना हो. प्रसंगांतर के बावज़ूद कहना चाहूंगा कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब से मिलकर भी ऐसी ही प्रतीति हुई थी. कोई दो-एक घण्टे उनसे बातचीत करके जब विदा लेने लगा तो जाने क्यों खान साहब ने पूछ लिया कि ‘तुम सिगरेट पीते हो?’ उनका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि मुझसे झूठ नहीं बोला गया. खान साहब ने अपना विल्स का पैकेट मेरी तरफ बढ़ाते हुए आग्रह किया कि मैं भी एक सिगरेट पी लूं, और मैंने उनसे कहा कि मेरे संस्कार मुझे इस बात की अनुमति नहीं देते हैं कि अपने पिता तुल्य के सामने धूम्रपान करूं! खान साहब ने जो कहा, वह मेरे मन पर जैसे खुद चुका है. बोले, “बेटा1 ले लो! हमारा हुक्म है. हम फिर कभी ऐसा नहीं कर पाएंगे.’ आज भी उनका वह बड़प्पन याद आता है तो मन ही मन नतशिर हो जाता हूं. लेकिन यहां तो बात मैं दान सिंह जी की कर रहा था. दान सिंह जी उस दोपहर हम चारों से ऐसी सहजता से बतिया रहे थे जैसे हमारी बरसों की पहचान हो. बातों के बीच उन्होंने अपना हारमोनियम भी मंगवा लिया था और बातें करते हुए मौज में आकर वे हमें अपने सृजन का प्रसाद भी देते जाते थे. उनकी जीवन संगिनी डॉ उमा याग़्निक जी भी इस गपशप में शरीक थीं. उस दोपहर हमने न जाने कितनी बातें कीं. संगीत की, संगीत की दुनिया के छल-प्रपंचों की, गायक-गायिकाओं की, फिल्मों की, मुंबई की और भी न जाने कहां-कहां की. उस दोपहर की वो लगभग पूरी बातचीत मैंने रिकॉर्ड कर रखी है. मुझे जो बात सबसे ज्यादा रेखांकनीय लगी वो यह कि दान सिंह जी में कहीं किसी के प्रति लेशमात्र भी नाराज़गी या कटुता का भाव नहीं था. जब उन्होंने यह प्रसंग सुनाया कि कैसे उनकी बनाई धुन पर किसी और ने गाना बनाकर मुकेश से गवा लिया, तो मुझे लगा कि जैसे वे अपनी बनाई हुई नहीं किसी और की बनाई धुन की बात कर रहे हैं. यह बहुत गैर मामूली बात है. मुझे आज भी इस बात को यादकर आश्चर्य होता है कि इतने प्रतिभाशाली होने के बावज़ूद संगीत की दुनिया की राजनीति की वजह से हाशिये पर डाल दिए गए दानसिंह जी के मन में इस बत को लेकर ज़रा भी मलाल नहीं था. वे अपने हाल में परम सुखी-संतुष्ट थे. अगर उस दोपहर उनके सान्न्निध्य में कुछ वक़्त न गुज़ारा होता और किसी और ने मुझसे उनके बारे में यह बात कही होती तो मैं विश्वास नहीं करता.

आज जब दान सिंह जी इस दुनिया में नहीं हैं, उनसे हुई सिर्फ इस एक मुलाक़ात के कारण मुझे लग रहा है कि मेरे अस्तित्व का एक हिस्सा मुझसे ज़ुदा हो गया है और मैं अधूरा रह गया हूं. मन में बहुत सारी बातें घुमड़ रही हैं लेकिन अस्त व्यस्त मन:स्थिति में उन्हें शब्द बद्ध नहीं कर पा रहा हूं. लेकिन बार-बार वह एक दोपहर मुझे याद आ रही है जो हमने दान सिंह जी के सान्निध्य में बिताई थी और उसी के साथ याद आ रहा है फिराक़ गोरखपुरी का यह मशहूर शे’र:

आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअस्रों
जब ये ध्यान आयेगा उनको तुमने फ़िराक़ को देखा था!

सम्पर्क सूत्र:
ई-2/211, चित्रकूट, जयपुर- 302021.

Leave a Comment :, , , more...

Khemchand Prakash lives on!

by pavanjha on Aug.10, 2010, under 50s, Artists, People, Special Events, tribute

Today is Khemchand Prakash ji’s 60th death anniversary. It sixty years since he passed away but his music still lives on..

On December 12, 2007, to commemorate 100th Birth Anniversary of Legendary Music Director of Hindi Film Music, Sh. Khemchand Prakash, Suryatra did a short documentary on life and music of Sh. Khemchand Prakash.

Here is the first part of the documentary :

and the second and concluding part :

Leave a Comment :, , , more...

मेरी आवाज़ ही पहचान है ? [Video Presentation]

by pavanjha on Aug.01, 2010, under 50s, 60s, Artists, People, Trivia

फ़िल्मों में तीस के दशक में पार्श्वगायकी के दौर के शुरु होने के बाद पार्श्व गायकों ने फ़िल्म और संगीत रसिकों से एक अनूठा रिश्ता कायम किया।

“आवाज़ का रिश्ता!”

भारतीय फ़िल्मों के स्वर्णिम दौर में कई महान गायकों ने अपनी आवाज़ के जादू से, रुपहले पर्दे पे आए बिना, सुनने वालों के दिल में एक अमिट स्थान बना लिया…

उनकी आवाज़ उनके व्यक्तित्व की अमिट पहचान बन गयी।

इनमें से कई गायक परदे पर अभिनेता के रूप में कई बार अवतरित भी हुए। कुछ मुख्य तो कुछ चरित्र भूमिकाओं में… जब भी इन गायकों पर परदे पर गीत फ़िल्माए गए तो ये नामुमकिन सा था कि अपने खुद के किरदार के लिये किसी और का पार्श्व गायन हो…

मगर इस मायानगरी की माया अनूठी है, अन्दाज़ निराले हैं!
ऐसे भी मौके आये, जब इन महान गायकों को (खासकर किशोर कुमार) को अन्य गायकों की आवाज़ उधार लेनी पड़ी…

जब इनकी आवाज़ परदे पर इनकी पहचान ना रही….

आइये, देखें ऐसे ही कुछ लम्हे, कुछ गीत, उधार की आवाज़ के साथ!

साथ ही प्रस्तुत हैं, कुछ ऐसे भी गीत जब ये गायक, अभिनेता ना होने के बावज़ूद पर्दे पर गीतों पे अवतरित हुए, और आवाज़ के रिश्ते के साथ साथ पर्दे पर भी एक रिश्ता कायम किया!

(प्रस्तुति 15 मिनट की है, मगर youtube पे 10 मिनट की सीमा की वजह से कई जगह छोटी कर दी गई है, जिसका असर गानों मे परिवर्तन के समय थोड़ा सा म्हसूस किया जा सकता है।)

1 Comment :, , , , , , , , , more...

Juthika Roy Birthday Celebrations [Video]

by pavanjha on Apr.24, 2010, under Artists, Events, Special Events

On 20th April, 2010, early AM, Sur Yatris celebrated Juthika Ji’s 91st birthday with her at the hotel.
Here is the video:

1 Comment :, , , more...


Juthika Roy Shikhar Samman : News Coverage

by pavanjha on Apr.21, 2010, under Artists, Events, General, Press, Special Events

जीवंत हुआ आजादी का पहला सुर

Bhaskar News
First Published 00:46[IST](19/04/2010)
Last Updated 00:46[IST](19/04/2010)

[Original Source : http://www.bhaskar.com/2010/04/19/yuthika-rai-in-jaipur-886683.html]

देश की आजादी की पहली सुबह 15 अगस्त, 1947 को आकाशवाणी से पहली देशभक्ति रचना गाने वाली लिविंग लीजेंड यूथिका रॉय रविवार को शहर के संगीत प्रेमियों से रूबरू हुईं। उनका यह कार्यक्रम सुर यात्रा की ओर से इंदिरा गांधी पंचायती राज संस्थान के ऑडिटोरियम में आयोजित किया गया। पहले सुर को सुनने के लिए संगीत रसिक कार्यक्रम के निर्धारित समय 7 बजे से पहले ही ऑडिटोरियम में पहुंच गए।

हालांकि नब्बे वर्षीय जीवित किंवदंती रॉय को संगीत रसिक हर हालत में सुनने को आतुर थे। यही वजह रही कि एक घंटे से भी अधिक का समय लोगों ने बड़े ही धर्य से बिता दिया। रात ठीक 8 बजे सफेद साड़ी में यूथिका रॉय ऑडिटोरियम में आईं तो लोगों ने खड़े होकर संगीत जगत की इस अजीम शख्सियत का स्वागत किया। इस दौरान उन्हें संस्था की ओर से शिखर यात्रा सम्मान भी दिया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत शहर की युवा गायिका सुप्रिया के गायन से हुई। सुप्रिया ने यूथिका के गाए पग घूंघरू बांध मीरा नाची, मेरे तो गिरधर गोपाल और म्हाने चाकर रखो जी सहित कई लोकप्रिय भजन सुनाए। बाद में यूथिका रॉय ने भी कुछ रचनाएं गाकर श्रोताओं की जिज्ञासा को शांत किया। इससे पूर्व दोपहर में यूथिका रॉय राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के सभागार में लोगों से रूबरू हुईं।

उन्होंने अतीत के कई यादगार लम्हे लोगों को सुनाए। उन्होंने कहा, आज का दिन मेरे लिए बेहद यादगार है। जयपुर में पहली बार आना हुआ है और ऐसे में अपने अतीत को याद करना तो और भी रोमांचित कर रहा है।

‘गांधीजी तो दीवाने हैं आपके गाने के’

सन् 1945 में हैदराबाद में एक बार किसी जमींदार ने उनसे कहा कि सरोजिनी नायडू आपका गाना सुनना चाहती हैं। मैंने कहा चलिए, वहां जाकर उनसे मुलाकात की और उन्हें गैर- फिल्मी गीत और भजन सुनाए। इस दौरान सरोजिनी ने मुझसे कहा, गांधीजी तो आपकी गायिकी के दीवाने हैं। इसके बाद गांधीजी से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई तो कोलकाता चली आई, वहां पर गांधीजी अपने अनुयाइयों के साथ आए हुए थे।

मैं अपने परिवार के लोगों के साथ उनसे मिलने गई पर सफलता नहीं मिली। अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। भीगने से बचने के लिए हमने दरवाजा खटखटाया तो आभा गांधी ने दरवाजा खोला और पूछा किससे मिलना है। मैंने कहा मेरा नाम यूथिका रॉय है, मुझे बापू से मिलना है। इतना कहने पर उन्होंने मुझे अंदर बुलाया और कहा सामने वाले कमरे में गांधीजी हैं, जाइए मिल लीजिए। यहां पर मैंने गांधी को अपने प्रिय भजन ‘पग घुंघरु बांध मीरा नाची थी..’ व ‘घर आयो प्रीतम प्यारा..’ सुनाया। उन्होंने मेरे सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और कहा तुम बहुत ही अच्छा गाती हो।

खत्म हो गए प्यार के दो पल

बीते जमाने को याद करते हुए उन्होंने कहा, पहले का जमाना अलग था। लोगों के दिलों में जज्बात धड़कते थे। एक-दूसरे से कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। उनके चलने- बोलने और बात करने का तरीका भी कुछ अलग हटकर हुआ करता था, इसलिए उनमें प्यार झलकता था। आजकल यह प्यार खत्म हो गया है।

Comments Off :, more...

Looking for something?

Use the form below to search the site:

Still not finding what you're looking for? Drop a comment on a post or contact us so we can take care of it!

Visit our friends!

A few highly recommended friends...